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क़तार

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क़तार क़तार में खड़ा है देश  रफ़्तार है रुकी हुई  अपना पैसा आप नहीं मिलता  साँसें हैं थमी हुई पर चुप रहूँगा मैं  आवाज नहीं उठाऊँगा  विरोध प्रकट किया अगर  देशद्रोही कहलाऊँगा  क़तार में खड़े -खड़े  मातृभूमि का कर्ज़ चुकाऊँगा  भूखा हूँ तो क्या हुआ  मर नहीं जाऊँगा  अगर दो दिन नहीं खाऊँगा  स्वच्छता अभियान में  सरकार का साथ निभाऊँगा  नींद बहुत आयेगी तो  सड़क पर ही सो जाऊँगा  लोकतंत्र का पैरोकार हूँ  लोकतंत्र ने ही सिखाया है  लंबी-लंबी लाईन में हमने वोट गिराया है  देश का सारा धन सिमट गया कुछ हाथों में ईमानदारी से आयकर चुकाऊँगा  पर उनपर उंगली नहीं उठाऊँगा  लोकतंत्र की घुट्टी पीकर  अबतक गृहस्ती चलाई है  लोकतंत्र जब खतरे में है  तो अब क्यों पीठ दिखाऊँगा  क़तार में जीना क़तार में मरना  हमने अब है सीख लिया  लोकतंत्र में लोक की आफत  यही मंत्र दोहराऊँगा ।           ...

दाना माँझी की घटना ने मुझे भी झकझोड़ कर रख दिया, मन में जहाँ एक तरफ गहरी पीड़ा थी तो दूसरी तरफ व्यवस्था के प्रति आक्रोश और अपनी असहाय स्थिति के प्रति क्षुब्धता का भाव तथा पता नहीं और क्या-क्या जो इस रचना के जन्म का कारण बनीं..........

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कालाहाँड़ी   कल रात मैं ने एक अजीब स्वप्न देखा मैं एक काली हाँड़ीनुमा द्वार पर खड़ी हूँ गोल पर छोटा सा है वह द्वार अभी-अभी एक व्यक्ति अपने कंधे पर कुछ लादे भीतर गया है उसके साथ एक बच्ची भी है मैं उसके साथ भीतर जाना चाहती हूँ पर वहाँ खड़ा संतरी मुझे अंदर जाने से रोक देता है मुझसे पूछता है ढ़ेरों सवाल- कौन हो तुम ? कोई खोजी पत्रकार ? शिक्षकों का यहाँ क्या काम ! यहाँ क्यों आये हो ? उस व्यक्ति से क्यों मिलना चाहते हो ? कोई नाता-रिश्ता ? हितैषी !  यह कौन सा रिस्ता होता है ? बताती हूँ उसे कि‌‌‌‌-  वास्तविक आजादी का अर्थ ढूँढने आई हूँ उन प्रश्नों के उत्तर ढूँढने आई हूँ जो मेरे छात्र अक्सर मुझसे पूछते हैं-  ‌‌ 'जब भारत दुनियाँ के दस सबसे धनी देशों में शामिल है तो भी दाना माँझी जैसे लोग देश में क्योंं हैं'?   बच्चे मुझे आँकड़े दिखाते हैं 'भारत व्यक्तिगत संपति के मामले में दुनियां में सातवें स्थान पर है मैडम आप यह क्यों कहती हैं कि भारत गरीब है' मेरे छात्र समृद्ध परिवारों से आते हैं उन्हें नहीं पता गरीबी क्या होती ह...

रुका हुआ समय

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रुका हुआ समय  भीड़ भरी सड़क पर चलते-चलते ऐसा लगा जैसे समय रूपी नदी में सब बहे जा रहे रफ़्तार से - आगे की ओर सिर्फ मैं ही एक चट्टान की भाँति खड़ी हूँ सारे झंझावातों को झेलते हुए नदी के बीचों बीच निश्छल, निर्जीव समय की तेज धार मुझ पर वार कर रही अपने तेज नाखूनों से मैं खुरचती जा रही हूँ थोड़ी-थोड़ी पर कुछ है जो थम सा गया है मेरे अंदर वह इस बहाव का हिस्सा नहीं मेरे लिए तो समय वहीं रुक गया था जहाँ तुम मुझे छोड़ कर गए थे कहना चाहती हूँ समय की इस धार से हो सके तो एक बार मोड़ ले रुख अपना वहीं जहाँ  एक दिल है जो धड़कना भूल गया है एक तितली है जो पंख फैलाये उड़ने को आसमान में टंगी पड़ी है एक फूल है जो अधखिला रह गया है एक गीत है जो गाई न जा सकी एक मीठा बोल है जो बोला न जा सका अभी तो एक खत को पते तक पहुँचाना बाकी है अभी तो एक दोस्ती का बढ़ा हुआ हाथ थामना बाकी है अभी तो मेरी झुल्फों को उसके कन्धों पर बिखरना बाकी है अभी तो मुझे सावन बन उसपर बरसाना बाकी है वक़्त की धारा अगर रुक सको तो रुक जाओ एक पल केलिए सिर्फ मेरे लिए मैं...

आज प्रेमचंद जी का जन्मदिवस है | प्रेमचंद मेरे लिये सिर्फ एक लेखक का नाम नहीं है बल्कि एक ऐसी हस्ती जिन्होंने हृदय को कहीं गहरे में छूआ है | कभी मर्माहत तो कभी आश्चर्यचकित किया है | जब भी उनको पढ़ती हूँ सोचती रह जाती हूँ कि किसी व्यक्ति को मानवीय संवेदनाओं का इतना ज्ञान कैसे हो सकता है ! आज उनको समर्पित करती हूँ अपनी यह कविता ......

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तलाश  आश्चर्यचकित हूँ कि  मैं खुद से ही कितनी अपरिचित हूँ  मेरे अंदर छिपे हैं मेरे ही कितने रूप  कल मैं ने पाया मेरे अंदर से एक बच्ची निकल आई -  वह बादलों को छूना चाहती थी  वह तितलियों को पकड़ना चाहती थी  वह इंद्रधनुष की नाव बना  पूरी दुनियां की सैर करना चाहती थी  और घर के हर कोने में उस माँ को ढूंढ़ रही थी  जो बहुत पहले उसे छोड़ कर जा चुकी है  माँ को न पा वह फूट-फूट कर रोती रही   फिर रोते-रोते ,हिचकियाँ लेते-लेते वह मर गई। आज न जाने कब मेरे अंदर से निकल आई एक किशोरी  सुंदर, सुकुमार, कल्पनाओं के पंख पर सवार  उसके सपने नितांत अधूरे थे, उसकी भावनाएं नितांत कोरी, पाकीजा  उसका शरीर सीसे सा झलक रहा था  मन गंगा जल सा पावन  जीवन से भरी थींं उसकी आँखें  उसके चेहरे से मुस्कान कभी मिटती नहीं थी  हर इंसान उसे भला लगता था  वह जीवन को पूर्णता में जीना चाहती थी  उसकी कल्पनाओं और जीवन की वास्तविकताओं में  कोई मेल न था  सुको...

जीवन का खेल कितना अनोखा है कभी-कभी यह मुझे अचंभित कर देता है, जब कुछ ऐसा घटता है जिसकी कभी कल्पना भी नहीं की थी मेरी यह कविता इसी भाव दशा में लिखी गई है .....

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क्या सखी तुमने भी देखा है ? कोमल, मृदुल और सुवासित बेहद रंगीन,  बेहद सुंदर  जीवन के मधुमास काल में  बिना खिले ही किसी पुष्प को  धीरे-धीरे झरते देखा है  क्या सखी तुमने भी देखा है ? आँखों-आँखों में ही  सराहा  मन ही मन में किसी को चाहा  अन बोले उस अप्रकट प्रेम को  जीवन के चक्रव्यूह में फँस कर  धीरे-धीरे मरते देखा है  क्या सखी तुमने भी देखा है ? प्रेम विभोर किसी प्रेयसी के  मन आँगन में उगे हरसिंगार से  किसी अँधेरी आधी रात को  सफेद-केसरिया भाव सुमन  हौले-हौले झरते देखा है  क्या सखी तुमने भी देखा है ? दग्ध हृदय है व्याकुल आहें  राह तकती थकी निगाहें  प्रियतम से बिछड़ी विरहन को  सावन की रिमझिम रातों में  तिल-तिल कर जलते देखा है  क्या सखी तुमने भी देखा है ? सुख समृद्धि के चरम पे पहुँचे रीतेपन का एहसास लिए  रिश्तों की भीड़ में तन्हा  किसी बावले भावुक इंसा को  बिलख-बिलख रोते देखा है  क्या सखी तुम...

सूर्य का ताप अपने चरम पर है, सब की एक ही इच्छा है - बरसो रे बदरा झमझम कर, ऐसे में धरती की पुकार को मैं ने अपनी इस कविता के माध्यम से स्वर देने की कोशिश की है .......

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मैं धरा तुम अंबर के मेघ  तुम हो  मेरे स्वप्न देव  मैं धरा तुम अंबर के मेघ  तेरे जल कण को तरसती  उड़ती धूल संग पवन वेग । मैं अकिंचन शुष्क रेत  है अतृप्ति प्रचंड शेष  मेरी हरीतिमा के सुख-स्रोत मैं प्यास तुम सुधा अशेष । तुम से जो रसधार बरसे  मैं मुदित जी भर नहाउँ  तुम बनो बैकुंठ मेरे  चख सुधा अमरत्व पाऊँ । फूटे  अंकुर चीर सीना  जीवन की पहचान बनकर  मैं ओढूँ धानी चुनरिया   तुम उड़ो निर्भार होकर । तुम से ही जीवन धरा पर  तुम से ही है आत्मा  तुम झमाझम मुझ पे बरसो  तृप्त हो जीवात्मा ।                                                  -  मुकुल अमलास                             (चित्र गूगल से साभार )

अमलतास

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अमलतास  अमलतास के सारे पत्ते झड़ गए थे गर्मी आते ही पेड़ ठूँठ सा खड़ा था दिल में एक हूक सी उठती थी देख कर कुछ दिनों बाद छोटे-छोटे पत्ते निकल आये नाजुक सी कोमल-कोमल पत्तियाँ मैं ने उँगलियों से छूआ  लगा मेरी उँगलियाँ बहुत रुखी हैं पत्ते बहुत ही कोमल हैं ये उँगलियाँ उनका नुकसान कर बैठेंगी डर कर छोड़ दिया जल्दी से फिर कुछ ही दिनों में निकलआए उसमें पीले-पीले फूलों के गुच्छे धरती की ओर झुके हुए मैं सोचने लगी सारे फूल तो ऊपर की ओर खिलते हैं ये अमलतास के गुच्छे नीचे की ओर क्यों झुके होते हैं ?  इतनी सुंदरता और ऐसी सादगी ! गजब का है उसका सौन्दर्य जब उसके गोल-गोल छोटे-बड़े फूल हवा में डोलते हैं सागर के उर्मिल तरंगों सा मन हिलोरें लेने लगता है हियरा जुड़ा जाता है और भला बसंत कैसे आता है ?                                                        --- मुकुल कुमारी अमलास ( चित्र गूगल से सा...