आज विश्व कविता दिवस और साथ ही ओशो का संबोधि दिवस भी.........तो एक कविता सदी के इस महानतम संबुद्ध के नाम......



 जिंदगी के पन्ने

कोरे सादे स्लेट से थे
जिंदगी के पन्ने
फिर ना जाने कब
रब ने घीस दिया उसे
छोटे बच्चे के हाथ में आई
पहली कलम और किताब की तरह
हर कहीं अब बस आड़ी-तिरछी लकीरें
पथ ही पथ कोई पड़ाव नहीं
उस पर चलते-चलते
अब थका मन
हारा अस्तित्व
कुछ राहें कहीं नहीं ले जातीं
चाहे चलते रहें जीवन भर
बेहतर यह जल्दी समझ
हम बदल लें राह
दूसरों को बदलने की आशा छोड़
बनाएं ख़ुद को कुछ बेहतर
तो चल पड़ी अपनी ही परछाई के पीछे
खुद को तलाशती हुई
परछाई के नाक-नक्श नहीं होते
तो कैसे पहचानती खुद को
सिर्फ़ होता आकार
वह भी रहता घटता-बढ़ता
फिर खुला भेद अपनी मूर्छा का
कि किस बूते दूसरे को समझने का दावा करते हम
जब खुद से खुद की दूरी
तय करना हो मुश्किल
तो मैं अपने घर को छोड़ निकली ऐसे
जैसे शरीर से निकलने के बाद
मृत शरीर को देखती सोचती हो आत्मा
क्या यह मेरा ही शरीर था
और फिर मैं ने
अपने 'मैं' को मारने की शुरुआत कर दी।

.......मुकुल अमलास.......

(चित्र गूगल से साभार)



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