संदेश

मन के उहापोह को पंक्तियों में आबद्ध करने की एक कोशिश......

  मैं स्वयं में पूर्ण हूँ एक दिन घर के कलह से हो कर बेहाल और जीने की इच्छा त्याग , निराश मन आ बैठी मैं अपने बगीचे के एक कोने में देखा कई रंग के फूल खिले हैं मस्त हवा में डोल रहे हैं डालियों पर है निखार पत्ते-पत्ते पर आई है बहार एक चिड़ा एक चिड़ीया को छेड रहा है कभी उसके चोंच और कभी उसके पंखों से खेल रहा है , क्षण भर में मिट गया मेरे मन का  विषाद कितनी अनुपम प्रकृति और कितना सुदंर उसका उपहार सब कुछ है कितना भला मानवीय रिस्तों में ही है क्यों इतनी दुरुहता , कुरुपता | मन में आया क्या इन पौधों को भी कोई गम सालता होगा ? लगता तो नहीं इनकी तो जडों में है पानी   और उपर खिली धूप की छानी पत्ता-पत्ता थिरक रहा जैसे कोई गीत गुनगुना रहा क्यों न नाचूँ मैं भी इनके संग जब तक हो जाउँ न बेदम जैसे हर पौधे का अलग-अलग रंग-ढंग वैसे ही मैं भी तो हूँ इस प्रकृति की सौगात तब किसी मानव से जुड़े बिना क्यों नहीं हूँ मैं पुर्ण ? मेरे साथी ये फूल हैं ये पत्तियाँ जो झूम-झूम जीवन का संदेश दे रहे हैं ये हवायें जो मेरे बालों से ख...

गर्मी की छुट्टी मौका देती है भ्रमण का , अपने गाँवके भ्रमण के बाद लिखी गई यह कविता, प्रस्तुत कर रही हूँ----

चित्र
अपने गाँव की यात्रा गाँव भी वही और घर भी वही बस बीच में है समय का एक लंबा अंतराल बहुत दिनों बाद अपने बचपन से मिलने आ पहूँची हूँ अपने गाँव ,    एक जमाने में खानदान की शान हमारे दलान का खंडहर एक मलवे के रुप में पड़ा जैसे रो रहा है , न तो बाबुजी का धीर-गंभीर स्वर  न उनकी सारगर्भित बातों को सुनने बैठे उन्हें  घेरे , लोगों की जमात ,   दादी के पूजा घर से उठती न तो सुगंधित धूप की महक न घंटी की टुनटुन , माँ के पळंग का सूनापन हृदय को जैसे निचोड़ रहा है मेरी नजर सदा उनके साथ रहने वाले पनवट्टे को ढूँढ़ रही है ,   जिस सोफे पर बैठ घंटों बाबुजी से बातें होती थी वह टुटा पड़ा है।  घर जो कभी हवेली कहलाता था ,   पर हम बच्चों के लिये किसी महल से कम नहीं था , उसकी दिवारें चटक गईं हैं और छत का प्लास्टर उतर गया है ,   घर का कोना-कोना बिते दिनों की कहानी कह रहा है और एक संवाद हमारे बीच में चल रहा है , सामने पड़ा नारियल का ठूँठ मेरे मन को तड़पा रहा है इसका ठंडा पानी कभी गले के साथ-साथ आत्मा को भी तर क...