संदेश

प्रेम भी अजीब शय है , सच कहा है प्रेमी दीवाने होते हैं । उनकी बातें आम आदमी के पल्ले न पड़े । उनकी कल्पनायें स्वर्गीय होतीं हैं । चलिये आज उन्हीं के नाम यह कविता ...............

दरिया किनारे चलो  मद्धिम सी रोशनी चाँद तारों की है  मेरे संग संग  दरिया किनारे चलो  भिंगी भिंगी हवा में एक रवानी सी है  कोई मीठी सी बात तुम हमसे कहो  हौले हौले मेरी झूल्फ उड़ती रहे धीरे धीरे तुम मेरी बहियाँ गहो  एक नौका में बैठ हम तिरते रहें  सिर्फ नदिया की धारा हमारे संग हो  आज बादलों के संग दौड़ की होड़ हो  आज की रात चलो कुछ ऐसा करो  दे गवाही ये दरिया हमारे प्यार की   न मैं कुछ कहूँ न तुम कुछ कहो ।

दिल से निकली एक प्रार्थना ऐसी भी जो महाभोग से निर्वेद की ओर ले जाए......

एक प्रार्थना ऐसी भी हे दाता , जब शरीर दिया है स्वास्थ्य भी देना,       ताकि मैं तेरे दिये गये इस अनुपम उपहार का उचित , भरपूर और सुंदर उपयोग कर सकूँ | इन आँखों से मैं देख सकूँ विश्व के सुंदरतम दृश्यों को | इन कानों तक पहुँचे इस जग का सबसे मधुरतम स्वर और संगीत | इन नथुनों में भर सकूँ मैं मधुर से मधुरतम गंध,  कोई कस्तुरी या गंधराज का राज , राज न रहे | इन होठों ने चखा हो दुनिया के सबसे उत्तम व्यंजनों का स्वाद और अब कुछ चखने को न बचा हो शेष | इन हाथों से हुआ हो अपने बुजुर्गों का चरण स्पर्श और माथे ने पाया हो,  उनके हाथों से निरंतर बहता आशिर्वाद | इस शरीर ने महसूस किया हो अपने प्रिये का मरमरी, कोमल स्पर्श और इन बांहों ने भरा हो अपने ही खून का एक अंश | क्या बचा है इस दुनियाँ में फिर भोगने को !  जब इस शरीर का अंत हो कोई भी इच्छा अधूरी न रहे , जब शरीर होगा तृप्त फिर आत्मा कैसे रहेगी अतृप्त !   इस शरीर रुपी मंदिर की पुजारिन आपसे मांगती है आज इतना ही अगर दे सको तो, दे दो यह महाभोग | ...

चाह की कोइ सीमा नहीं , मैं क्या - क्या चाहती हूँ एक कविता के रुप में......

              मैं चाहती हूँ   मैं चाहती हूँ लौट जाना अपने बचपन में जहाँ है मेरी माँ ढ़ेर सारा प्यार आँखों में लिए ,   मेरी राह तकती | मैं चाहती हूँ नील कमलों को चुन एक बेनी बनाना और टाँकना अपने बालों में ,  अप्सराओं सी | मैं चाहती हूँ नदियों संग उतरना पहाड़ों से और झरना बन ,   छींटे उड़ाना दूर तक | मैं चाहती हूँ आकाशगंगा में तिरना इंद्रधनुष की नाव में बैठ कर , ब्रह्मांड के अंत तक  | मैं चाहती हूँ गंधराज की खुशबू बन ,  उड़ जाना चारों दिशाओं में ,   तितलियों के संग संग | मैं चाहती हूँ भूखों की रोटी और प्यासों के लिए ठंडा जल बन , हो जाना उनकी तृप्ति | मैं चाहती हूँ ,   सुनना उस अनहद निनाद को जो कहते हैं गूँजता है अहर्निश चारों दिशाओं में | मैं चाहती हूँ ,    शरीर के दुःख , पीड़ा , बंधनों से मुक्त होना और जीना सिर्फ आत्मा के सहारे | क्या मेरा चाहना कुछ अधिक है ?

मिलन

          मिलन अकेलापन एक संताप एक तकलीफ एक टीस जो चुभती है एक ऐसी सहेली जो साथ नहीं छोड़ती | थक गई हूँ इसे ढोते-ढोते अब सहा नहीं जाता काश ! यह अकेलापन इतना घनीभूत हो जाए कि जाऊँ मैं पिघल मेरा रेशा-रेशा भाप बन कर विलिन हो जाए इस ब्रह्मांड में मेरा जर्रा-जर्रा बिखड़ जाए ऐसे कि मैं मिल जाऊँ इस संपूर्ण सृष्टि में मेरा ‘ मैं ’ तिरोहित हो जाए सदा के लिए और मेरा अस्तित्व ही न बचे क्या कभी होगा यह मिलन ? कैसा होगा यह मिलन ? हाँ यह मिलन ही अकेलेपन से मुक्ति है उस अरुप ब्रह्म से मिलन शाश्वत का दर्शन |

मौसम के अनुकूल मेरा यह प्रयास |

                                      गर्मी का मौसम आसमान से लपटें उठती , आग उगलती धरती है    रोम-रोम है झुलसा जाता , बहुत सताती गर्मी  है   |                  चिलचिल करती धूप है जलती ,   नहीं  दूर तक पानी है पशु-पखेरु बेहाल हो रहे , इस मौसम की  कैसी बेरहमी है सूखे  घाट , नदी-नाले हैं सूखे , कहीं  नहीं  हरियाली  है गले की प्यास बुझ नहीं पाती , गजब सी त्रास तूफानी है टप-टप पसीना चूता दिनभर , एसी-कूलर की मारा-मारी है हवा में तपन है ,   वदन है  ठंड़ा , कितनी बड़ी हैरानी  है सड़क है सूनी , गलियाँ सूनी , फैली चारों ओर वीरानी  है घर के अंदर बंद हो रहे सब , कहीं  ना  आवाजाही   है नहीं-नहीं यह शहर नहीं है , यह दृश...

जिंदगी सदा मेरे लिए एक अबूझ पहेली रही है,इस पहेली को एक कविता के रुप में बूझने की कोशिश.

अबूझ पहेली कैसी अबूझ पहेली है यह जिंदगी कितना मुश्किल , समझ पाना इसे  कभी लगता है सबकुछ है अपने हाथ में , जैसे चाहें समय को मोड़ लें , अपने पुरुषार्थ पर होता है गर्व , अपनी कर्मठता पर विश्वास , लेकिन दूसरे ही पल जैसे सब कुछ हाथ से फिसल जाता है | कुछ भी तो नहीं अपने हाथ में अपने साथ में हमारे चाहे कुछ नहीं बदलता सब दैव अधिन है , सुख-दुख की आँख-मिचौली खत्म ही नहीं होती | गया वक्त पारे सा ढलक गया आने वाला  वक्त भी क्या सूखे पत्तों सा बिखड़ जायेगा ? क्या करुँ कि कुछ बंध जाये ऐसे आँचल में जो रहे हमेशा साथ और दिलाये स्वयं की सम्पूर्णता का एहसास क्या करेगा कोई मेरी मदद यह बताने में |

बेटियों के लिये मेरे मन में जो एहसास है, उसे शब्दों की माला में पिरोने की एक कोशिश.........

            बेटी एक सपन सलोना बेटियाँ  हैं    भिंगी   बयार ,   बेटियाँ  हैं    ठंडी   फुहार बेटी के आ जाने से , जीवन में आ जाती है बहार बेटी को जन्म देना , एक सपन सलोना होता  है |                 अभी तक कहाँ भूला वो नवजात शीशु का उनींदा चेहरा                 वो शरीर की गर्महट और आंचल में भर लेने का  सुख                 बेटी के बड़ी होते ही सबकुछ भूल-भूल जाना होता  है | याद  है  मुझे  तेरा  मचलना , रूठना  और  रोना फिर  चुप  हो ,  देर  तक हिचकी  लेना निंद  में कितनी भी हो प्यारी बेटी , जूदाई सहना ही होता है |             ...