संदेश

अच्छा लगता है

अपनी इच्छाओं पर हमेशा लगाम कसे रहना  अ च्छा नहीं होता , कभी उसे बेलगाम कर छूट भी देनी चाहिए, फिर कायदे से बाहर जाने पर क्या अच्छा लगता है देखिए  इस कविता में ़़़़   अच्छा लगता है  सागर किनारे रेत पर बैठ तेरे कंधे का सहारा लिये नि : शब्द , मौन निहारना उठती-गिरती लहरों को अच्छा लगता है | अच्छा लगता है छत पर सफेद चादर बिछा तेरे बाँहों का तकिया बना, लेटना और तकना निस्सीम नीले आसमान को अच्छा लगता है | अच्छा लगता है एक लंबी ड्राइव पर निकलना बैठ तेरे साथ कार में और सुनना एक मधुर , मोहक लोकगीत अपने गाँव का अच्छा लगता है | अच्छा लगता है मक्के की रोटी के साथ सरसों का साग परोसना और उसकी सौंधी खुसबू में डूब तुम्हें चटकारे ले कर खाते देखना अच्छा लगता है | अच्छा लगता है   घनघोर बरसात में , चमकती हुई बिजली और गरजते हुए बादलों से  झूठमूठ डरकर तुमसे लिपटना अच्छा लगता है |j अच्छा लगता है काली , अंघेरी आधी रात में गर्म , नरम बिस्तर में लिपटे हुए तेरी बाँहों में पिघल जाना जिस्मों जान का अच्छा लगता ह...

अगर मैं कहूँ की पेड़‌-पौधे मुझसे संवाद करते हैं और उनसे मेरी दोस्ती है तो शायद आप हँसें, पर मेरी इस कविता को पढ़ने के बाद शायद आपको मेरी बातों पर भरोसा हो जाये ......

चित्र
  मुझसे संवाद करो ओ निसर्ग के उपहारों मुझसे संवाद करो यह माना हम तुम अलग बहुत मैं मानव तुम वनस्पति जगत पर यह रिस्ता बड़ा अनोखा  मैं सखी तुम्हारे बचपन की तुम मेरे मानस के परम सखा ओ जूही की कलियों मुझसे संवाद करो | लगता क्यों मुझको ऐसा है  हम तुम में सब संप्रेषणीय है न स्वर कंठ की आवश्यकता न अक्षर भाषा की बाधकता ओ मधुमालती की लताओं मुझसे संवाद करो | कोई सूक्ष्म तरंग सी आती है जो मुझे विह्वल कर जाती है तेरी खुशबू में एक वक्तव्य छिपा अतींद्रिय तिलिस्म का जाल बिछा ओ हरसिंगार के फूलों मुझसे संवाद करो | तेरी खामोशी कुछ  कहती  रहती   जहाँ मेरी इन्द्रिय नहीं पहुँच सकती बहुत बारीक हैं कुछ परदे  पड़े  जिनके आर पार हमदोनों  खड़े ओ चंपा की डालियों मुझसे संवाद करो | हवा में तेरे पत्ते जब डोलते हैं लगता कुछ भेद सा खोलते  हैं कभी अस्पष्ट , धुंधला सा  पाया कभी लगता सबकुछ समझ लिया ओ रातरानी की झाड़ियों मुझसे संवाद करो | ...

कार्यालय

कार्यालय उतरा हुआ चेहरा थका हुआ शरीर चारों ओर पसीने की महक लोंगों की लम्बी कतार अंगूठे लगाते हाथ मोटी मोटी फाइलें गुटका खाते हुए चपरासी कर्मचारियों का उबा हुआ चेहरा अधिकारियों के चेहरे पर निर्जीव सी निर्लिप्तता कैसी जिंदगी है यह यहाँ जिंदगी दौड़ती नहीं रेंगती है जहाँ जीवन छोटा होता जाता है पहचाना इस जगह को जी हाँ यह राज्य सरकार का कोई भी कार्यालय हो सकता है जहाँ पेशाब करने की सुविधा उपलब्ध तो हो पब्लिक के लिए पर उसमें जाने की हिम्मत आप न जुटा पाएँ और अगर कोई शौचालय बेहतर स्थिति में दिख भी जाए तो उसमें ताला लगा हो जी हाँ ऐसे ही कार्यालयों से हमें उम्मीद करनी है कि जनता के लिए वे शौचालय बनवायेंगे और एक स्वच्छ भारत का निर्माण होगा । ----मुकुल अमलास ----  (चित्र गूगल से साभार) 

प्रेम भी अजीब शय है , सच कहा है प्रेमी दीवाने होते हैं । उनकी बातें आम आदमी के पल्ले न पड़े । उनकी कल्पनायें स्वर्गीय होतीं हैं । चलिये आज उन्हीं के नाम यह कविता ...............

दरिया किनारे चलो  मद्धिम सी रोशनी चाँद तारों की है  मेरे संग संग  दरिया किनारे चलो  भिंगी भिंगी हवा में एक रवानी सी है  कोई मीठी सी बात तुम हमसे कहो  हौले हौले मेरी झूल्फ उड़ती रहे धीरे धीरे तुम मेरी बहियाँ गहो  एक नौका में बैठ हम तिरते रहें  सिर्फ नदिया की धारा हमारे संग हो  आज बादलों के संग दौड़ की होड़ हो  आज की रात चलो कुछ ऐसा करो  दे गवाही ये दरिया हमारे प्यार की   न मैं कुछ कहूँ न तुम कुछ कहो ।

दिल से निकली एक प्रार्थना ऐसी भी जो महाभोग से निर्वेद की ओर ले जाए......

एक प्रार्थना ऐसी भी हे दाता , जब शरीर दिया है स्वास्थ्य भी देना,       ताकि मैं तेरे दिये गये इस अनुपम उपहार का उचित , भरपूर और सुंदर उपयोग कर सकूँ | इन आँखों से मैं देख सकूँ विश्व के सुंदरतम दृश्यों को | इन कानों तक पहुँचे इस जग का सबसे मधुरतम स्वर और संगीत | इन नथुनों में भर सकूँ मैं मधुर से मधुरतम गंध,  कोई कस्तुरी या गंधराज का राज , राज न रहे | इन होठों ने चखा हो दुनिया के सबसे उत्तम व्यंजनों का स्वाद और अब कुछ चखने को न बचा हो शेष | इन हाथों से हुआ हो अपने बुजुर्गों का चरण स्पर्श और माथे ने पाया हो,  उनके हाथों से निरंतर बहता आशिर्वाद | इस शरीर ने महसूस किया हो अपने प्रिये का मरमरी, कोमल स्पर्श और इन बांहों ने भरा हो अपने ही खून का एक अंश | क्या बचा है इस दुनियाँ में फिर भोगने को !  जब इस शरीर का अंत हो कोई भी इच्छा अधूरी न रहे , जब शरीर होगा तृप्त फिर आत्मा कैसे रहेगी अतृप्त !   इस शरीर रुपी मंदिर की पुजारिन आपसे मांगती है आज इतना ही अगर दे सको तो, दे दो यह महाभोग | ...

चाह की कोइ सीमा नहीं , मैं क्या - क्या चाहती हूँ एक कविता के रुप में......

              मैं चाहती हूँ   मैं चाहती हूँ लौट जाना अपने बचपन में जहाँ है मेरी माँ ढ़ेर सारा प्यार आँखों में लिए ,   मेरी राह तकती | मैं चाहती हूँ नील कमलों को चुन एक बेनी बनाना और टाँकना अपने बालों में ,  अप्सराओं सी | मैं चाहती हूँ नदियों संग उतरना पहाड़ों से और झरना बन ,   छींटे उड़ाना दूर तक | मैं चाहती हूँ आकाशगंगा में तिरना इंद्रधनुष की नाव में बैठ कर , ब्रह्मांड के अंत तक  | मैं चाहती हूँ गंधराज की खुशबू बन ,  उड़ जाना चारों दिशाओं में ,   तितलियों के संग संग | मैं चाहती हूँ भूखों की रोटी और प्यासों के लिए ठंडा जल बन , हो जाना उनकी तृप्ति | मैं चाहती हूँ ,   सुनना उस अनहद निनाद को जो कहते हैं गूँजता है अहर्निश चारों दिशाओं में | मैं चाहती हूँ ,    शरीर के दुःख , पीड़ा , बंधनों से मुक्त होना और जीना सिर्फ आत्मा के सहारे | क्या मेरा चाहना कुछ अधिक है ?

मिलन

          मिलन अकेलापन एक संताप एक तकलीफ एक टीस जो चुभती है एक ऐसी सहेली जो साथ नहीं छोड़ती | थक गई हूँ इसे ढोते-ढोते अब सहा नहीं जाता काश ! यह अकेलापन इतना घनीभूत हो जाए कि जाऊँ मैं पिघल मेरा रेशा-रेशा भाप बन कर विलिन हो जाए इस ब्रह्मांड में मेरा जर्रा-जर्रा बिखड़ जाए ऐसे कि मैं मिल जाऊँ इस संपूर्ण सृष्टि में मेरा ‘ मैं ’ तिरोहित हो जाए सदा के लिए और मेरा अस्तित्व ही न बचे क्या कभी होगा यह मिलन ? कैसा होगा यह मिलन ? हाँ यह मिलन ही अकेलेपन से मुक्ति है उस अरुप ब्रह्म से मिलन शाश्वत का दर्शन |