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काश्मीर भारत का सिरमौर है । सिर्फ नक्शे में ही नहीं बल्कि वास्तव में भी । प्रकृति ने बड़ी उदारता से सजाया है उसे और बेपनाह खूबसूरती बख्सी है । जितने सुंदर वहाँ के लोग हैं उतनी ही सुंदर घाटियां और पहाड़ें । निश्चय ही ज़न्नत को देखने का एहसास सा है कश्मीर ।

काश्मीर तू ने दिये आँखों को अनगिनत दिव्य, सुन्दर दृश्य जो बन कर रहेगी अब विरासत सदा मेरे जीवन की मरते दम तक अब कैसे भूलेंगे वो सुन्दर नज़ारे जो गुमा देती रही धरती पर स्वर्ग के उतर आने की बहती नदियाँ ले गईं मुझे भी बहा कर दूर तलक देखा सपना मैं ने मेरे वज़ूद के पानी में मिल जाने की ऊँचे ऊँचे पर्वत और उसपे छाई बादलों की घटायें लगता है यूँ जमीं है पर आसमां के कहीं गुम जाने की चीड़, देवदार के वृक्ष खड़े हैं पहाड़ों पे कुछ ऐसे तन के जैसे खाई हो जां की कसम इन वादियों के रखवाली की फर के दरख़्तों को देख के होता है मुझे कुछ ऐसा गुमा जैसे ओढ़ के खड़ा हो  कोई इंसा   कंबल पाश्मीने की  भूरी, नीली, सफेद पहाड़ों की श्रृंखलाएँ गूँथी हैं यूँ आपस में निसर्ग सुंदरी ने जैसे पहना हो कोई हार अनेक रंगों की कैसा करिश्मा है नदी बहती है तो दूध का गुमां होता है ये वादिये कश्मीर जी करता है तेरी सूरत पे मर जाने की ।

मन का क्या है वह तो कुछ भी कल्पना कर सकता है जैसे शाम को सांवली परी के रुप में देखना , वो जब आती है तो एक जादू सा तिर जाता है चारों ओर और फिर क्या होता है देखते हैं इन पंक्तियों में ...............

शाम की सांवली परी  शाम की सांवली परी आने को है दिन ढ़लने को है रात होने को है अब मद्धम हुई दिन की रोशनी रात की दुल्हन ने ओढ़ी काली ओढ़नी बड़ी नाजुक सी है बड़ी अल्हड़ सी है  अपने में ही खोई बड़ी गुमसुम सी है  होठों में छुपे न जाने कितने राज हैं  सीने में दबी बड़ी तिलस्मी  आग हैं  बड़े अंदाज से डग बढ़ाती है वो  बड़े हौले सबको खुद में समोती है वो  चाँद की बड़ी सी बिंदी माथे पे लगा  तारों की झिलमिल सी आँचल सजा  धीरे धीरे जब गुनगुनाती है वो  कोई मीठी सी धुन जब बजाती है वो  बूढ़े बच्चे सभी को प्यारी सी लोरी सुना  अपने आगोश में सबको सुलाती है वो  चारों ओर जब छा जाती निस्तब्धता  बड़े हौले हौले अपने कदम को उठा  दिन निकलने से पहले मुँह को छुपा  दिन भर के लिये रात की दुल्हनियां  न जाने फिर  कहाँ चली जाती है  वो । 

आज मदर्स डे के मौके पर जब सभी अपनी अपनी माँ को याद कर रहे हैं मुझे भी अपनी माँ की याद आई और अनायास ये पंक्तियाँ दिल से निकलीं ........आज दिल में हूक उठती है  सभी पलकें भिंगोते हैं , मगर जबतक माँ रही जिंदा हम उसको कितना सताते हैं ।

न जाने कहां वो चले गये   खेत, खलिहान, नदी, पहाड़ सब ज्यों के त्यों हैं यूँ ही खड़े  सिर्फ जिंदगी में ही क्यों भला इतने तूफां आ के चले गये । अब ढूंढती हैं नजरें उन्हें जिनकी आँखों के हम नूर थे दर बदर खोजा उन्हें पर उनके साये भी हमसे दूर थे । खैरो ख़बर मिलती नहीं किस जहां में जाके वो सो गये है कौन सी वो गली कि जहाँ जाके वहीं के वो हो गये । बड़े नाजों से पाला हमें तामील,तमीज और तहजीब दी कभी भूल हमसे जो हुई कभी माफ करने में न देर की । कभी अपनी ख़बर भेज़ी नहीं न कोई ख़त, पैगाम दिये जो हमारे फिक्र में जीते थे आज इतने सख़्त कैसे हो गये ।  रो रो के हमने सदायें दी, उन्हें  बार बार पुकारा  किये  वो लौट कर न आये फिर न जाने किस जहां में खो गये | 

जिंदगी के खेल बड़े निराले हैं , न जाने कितने रंग दिखलाते हैं हमें और हम उसमें उलझे रह जाते हैं । जिंदगी की फ़ितरत को समझने की कोशिश इन गजलों के बहाने ।

ग़ ज़ल माना है हमने तुमको अपना दिल  से दिलोजां से एतवार करके तो देखो  हर इंसा झूठा नहीं होता । जाना तो होगा ही सबको  एक दिन इस दुनियां से फिरभी न जाने क्यों इसबात का भरोसा नहीं होता । न मेरी भावना समझी न मेरा रंजों गम जाना सिर्फ साथ रहने से कोई ग़मख़्वार नहीं होता । काश जिंदगी जी लेते हम भी  थोड़ी शिद्दत से ग़म है कि वक़्त को पलटना आसां नहीं होता । लाख दोस्त सही एक अकेला मेरा अपना होता जुगनुओं के मेले से क्या कभी दूर अँधेरा होता ।

जिंदगी को समझना कितना मुश्किल है ! क्या आज तक कोई इसे समझ पाया ? हमने तो जब भी इसे समझने की कोशिश की और उलझ कर रह गए ।इसी उलझन की अभिव्यक्ति हैं ये पंक्तियाँ ............

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जिंदगी एक अजीब शय अजीब शय है  ये जिंदगी  न आगाज बस में न अंत ही  कहूँ  इसे गजल या कि गायकी  कभी दर्द है कभी बेइंतिहा खुशी  कभी गाने को इसे दिल करे  कभी निकले मुँह से न शब्द भी  कभी प्यार भरा एक तोहफा  कभी दुःख भरी कोई शाप सी  नहीं आँसूओं का कोई मेरे हिसाब  न मुस्कुराहटों का कोई पारावार ही  अब जिंदगी देने वाले तू ही बता  है ये पिछले जन्म की कोई खता  या फिर समझूँ इसे तेरी कृपा  ये जिंदगी है आखिर क्या बला ?

यह प्रकृति बड़ी अनूठी है ,कुछ फूलों की खुशबू अद्वित्य होती है और भगवत्ता का आभास करा देती है इस कविता के बहाने कुछ ऐसा ही बांटना है ...........

    कामिनी की सुगंध हे कामिनी तुम ने अपनी खुशबू से मेरी बगिया को महका दिया है उस मधुर खुशबू से मेरा तन, मन और अंतरतम सराबोर हो गया है इस खुशबू की बारिश में मैं भिंग गई हूँ इसका नशीलापन मुझे मदहोश बना रहा है मेरी आँखें बंद हो गई हैं और मेरी पलकें भारी एक सुख है जो अवर्णनीय है मैं महसूस कर रही हूँ उस परमात्मा का सामीप्य जो कभी दिखता नहीं लेकिन आज तेरी वजह से दूर नहीं लगता तेरी महक इतनी मीठी है कि मैं इस मिठास से रोमांचित हूँ एक लहर है जिसमें मैं हिंडोले सा झूल रही हूँ एक ज्वार है एक तरंग है जो मुझे अपने साथ बहा ले जा रही है तू बता मैं तेरा कैसे धन्यवाद करुँ तेरा दिया उपहार अनमोल है फिरभी तू उसे बिना मोल के लूटा रही है कैसे करूँ तेरा शुक्रिया इसकी कीमत चुकाने की सामर्थ्य कहाँ करती हूँ तुझे प्रणाम हाथ जोड़ कर और मानती हूँ अपना अहोभाग्य कि मेरी घ्राणशक्ति सलामत है और मैं इस स्वर्गीय सुख को महसूस करने में समर्थ हूँ हे निसर्ग के उपहार तुझे प्रणाम अगर तू है तो परमात्मा कैसे नहीं है ?

क्या यह सच नहीं कि प्रकृति माँ की भाँति हमारे घावों पर मरहम लगाती है और वह सब सिखाती है जो हम किसी विश्वविद्यालय में भी नहीं सीख सकते , कुछ ऐसा ही इस कविता के बहाने ..........

प्रकृति की सीख घर गृहस्ती के झमेले से होकर बेजार इसकी उसकी बातों से हो कर दो चार बेजान कदमों से अकेली घर से निकल गुलमोहर तले आ कर बठी थी मैं एक छोटी सी गिलहरी पेड़ों से उतर पांव मेरे छूकर फूर्ति से गई जो निकल  बड़ा प्यारा लगा जी मेरा खिल गया कहीं कोयल तभी कोई कुहुक सी उठी मन मयूरा झूम-झूम नचने  लगा गुलमोहर की फूलों ने बरसात की तन मेरा भींग उठा मन चंदन हुआ ठंड़ी-ठंड़ी हवाओं ने जो चेहरा छुआ मैं पंख खोल तितली सी उड़ने लगी नीले आसमां में थे जो बादल घने मैं ने अपनी हथेली से उनको छुआ उसके ऊपर सूरज की खिली धूप थी  उसकी गर्मी बड़ी ही भली सी लगी कुछ चिडियाँ मेरे संग-संग थे उड़ रहे मैं ने पूछा उनसे उनका ठिकाना पता वो मुझे ले के अपने घर  को  चले था पहाड़ों के उपर एक सेमल खड़ा लाल फूलों की लाल-लाल नगरी बड़ी था वहीं उनका घोंसला तिनकों से बना जिसमें उनके बच्चे रहे थे चहचहा याद मुझको तब मेरे घर की हो आई तेज कदमों में मेरे अब एक रफ्तार थी मैं अपनी गृहस्ती संभालने को बेताब थी प्रकृति है माँ उसकी सीख है सबसे बड़ी इसमें ढूँढों तो प...