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लद्दाख का भ्रमण जैसे किसी दूसरी दुनियाँ में पहुँचने जैसा है और वहाँ प्राप्त हुये अनुभव नितांत अलग और पाकीजा,बहुत कुछ ऐसा जो पहले कभी न देखा और महसूस किया हो .......

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लद्दाख यहीं आ कर देखा मैं ने  आसमान का असली नीला रंग  यहीं आ कर देखा मैं ने  इतने ऊँचे पर्वत जो आसमां को भी छोटा बना दे  यहीं आ कर देखा मैं ने  असीम, अटूट, दिव्य शान्ति  जो मन की बेचैनी को चैन की नींद सुला दे  यहीं आ कर देखा मैं ने  निश्छल, निर्मल, पवित्र,अनछुये बर्फ से ढँकी चोटियाँ  जो तपस्वी की भाँति अपना आशीर्वाद बरसा रहा चहुँ ओर  यहीं आ कर देखा मैं ने  निर्झर, शीतल, सुगंधित हवाएँ  जो फैलाती हैं अपने चारों ओर असीम आनंद की लहरें  यहीं आ कर देखा मैं ने  निर्जन पर ऊर्जान्वित, जीवंत पहाड़ियाँ  जो निरंतर फैलाती हैं ऊर्जा का संवेग और कंपन  यहीं आकर देखा मैं ने  फूलों में दुनियां के असली रंगों को  जिसमें सागर की नीलिमा भी है, सुगंध की गहराई भी  यहीं आकर देखा मैं ने  पहाड़ों पर फैली बादलों की घटाएँ  जो विलीन कर दे धरती आसमान की दूरी  और बना दे दोनों को एक ।          ......मुकुल अमलास 

हाल ही में मैं ने अपना कुछ समय लेह और लद्दाख में बिताया| लद्दाख की पहाड़ियाँ जैसे कुछ कहती हैं , वहाँ की नीरवता में भी एक गूँज है पर इसका अनुभव वही कर सकता है जिसने आबादी के कोलाहल से दूर उन पहाड़ियों के सान्निध्य में कुछ समय बिताया हो | मेरा अनुभव तो यही है कि जैसे प्रकृति वहाँ अपने निश्छल स्वरुप में बिल्कुल हमारे पास होती है और उसका सामीप्य हर बार एक नया अनुभव दे जाती है ..........

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मैं और लद्दाख की पहाड़ियाँ लद्दाख की पहाड़ियों की तलहटी में बैठी मैं तकती हूँ चारों ओर इस निसर्ग की खुबसूरती को समेट लेना चाहती हूँ अपनी आँखों में | चट्टानों के पीछे आसमान कितना पास लगता है और उस चोटी के पीछे चाँद कितना करीब बस हाथ उठाओ और छू लो उसे कितना स्वच्छ , नीला आसमान | जी करता है जज्ब हो जाउँ यहीं इन घाटियों में इन रेतों और हवाओं में मिटा दूँ अपना वजूद शरीर का रेशा रेशा बिखड़ जाये इन वादियों में सब आयें मुझे ढूँढ़ने दें आवाज बार-बार और मैं इक छोटी सी बच्ची सी खिलखिलाती हुई अचानक निकल आऊँ चट्टानों के पिछे से और कर दूँ सब को अचंभित |   हर बार जब भी देखती हूँ इन पहाड़ों को आते हैं ऐसे ही विचार हरबार वो नये-नये रुप में आता है मेरे सामने हर बार होता है उसका सौंदर्य अलग या तो वो खुद बच्चा बन जाता है या मुझे बच्चा बना जाता है |  

प्रकृति हर पल कुछ सीख दे रही है और हम हैं कि आँखें मुँदे बैठे हैं, इधर उधर बिखड़ी चट्टानें भी कितना कुछ सिखा जाती है बस शर्त है कि हम उससे तादात्म भर जोड़ लें, मैं ने कोशिश की तो ये कविता उतर आई ..........

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             संतुलन और संबोधी             बुद्ध के चरणों और निसर्ग की गोद में             लद्दाख की पहाड़ियों और घाटियों के बीच             आ बैठी हूँ मैं सांसारिक कोलाहल से दूर             जहाँ है सिर्फ सनसनाती हवाओं की आवाज             चिड़ियों की चहचहाहट , ध्वजाओं की फड़फड़ाहट ,             घंटियों का नाद , निस्तब्धता का स्वर और शांति             चारों ओर काली , भूरी , नीली पहाड़ियों की श्रृंखलायें             और सबके पार सफेद , शुभ्र , बर्फ से ढ़ंकी चोटियाँ             जो एक के उपर एक पड़े हैं थिर संतुलित             सिखना है मुझे भी इन पत्थरों से बहुत कुछ             साधना...

काश्मीर भारत का सिरमौर है । सिर्फ नक्शे में ही नहीं बल्कि वास्तव में भी । प्रकृति ने बड़ी उदारता से सजाया है उसे और बेपनाह खूबसूरती बख्सी है । जितने सुंदर वहाँ के लोग हैं उतनी ही सुंदर घाटियां और पहाड़ें । निश्चय ही ज़न्नत को देखने का एहसास सा है कश्मीर ।

काश्मीर तू ने दिये आँखों को अनगिनत दिव्य, सुन्दर दृश्य जो बन कर रहेगी अब विरासत सदा मेरे जीवन की मरते दम तक अब कैसे भूलेंगे वो सुन्दर नज़ारे जो गुमा देती रही धरती पर स्वर्ग के उतर आने की बहती नदियाँ ले गईं मुझे भी बहा कर दूर तलक देखा सपना मैं ने मेरे वज़ूद के पानी में मिल जाने की ऊँचे ऊँचे पर्वत और उसपे छाई बादलों की घटायें लगता है यूँ जमीं है पर आसमां के कहीं गुम जाने की चीड़, देवदार के वृक्ष खड़े हैं पहाड़ों पे कुछ ऐसे तन के जैसे खाई हो जां की कसम इन वादियों के रखवाली की फर के दरख़्तों को देख के होता है मुझे कुछ ऐसा गुमा जैसे ओढ़ के खड़ा हो  कोई इंसा   कंबल पाश्मीने की  भूरी, नीली, सफेद पहाड़ों की श्रृंखलाएँ गूँथी हैं यूँ आपस में निसर्ग सुंदरी ने जैसे पहना हो कोई हार अनेक रंगों की कैसा करिश्मा है नदी बहती है तो दूध का गुमां होता है ये वादिये कश्मीर जी करता है तेरी सूरत पे मर जाने की ।

मन का क्या है वह तो कुछ भी कल्पना कर सकता है जैसे शाम को सांवली परी के रुप में देखना , वो जब आती है तो एक जादू सा तिर जाता है चारों ओर और फिर क्या होता है देखते हैं इन पंक्तियों में ...............

शाम की सांवली परी  शाम की सांवली परी आने को है दिन ढ़लने को है रात होने को है अब मद्धम हुई दिन की रोशनी रात की दुल्हन ने ओढ़ी काली ओढ़नी बड़ी नाजुक सी है बड़ी अल्हड़ सी है  अपने में ही खोई बड़ी गुमसुम सी है  होठों में छुपे न जाने कितने राज हैं  सीने में दबी बड़ी तिलस्मी  आग हैं  बड़े अंदाज से डग बढ़ाती है वो  बड़े हौले सबको खुद में समोती है वो  चाँद की बड़ी सी बिंदी माथे पे लगा  तारों की झिलमिल सी आँचल सजा  धीरे धीरे जब गुनगुनाती है वो  कोई मीठी सी धुन जब बजाती है वो  बूढ़े बच्चे सभी को प्यारी सी लोरी सुना  अपने आगोश में सबको सुलाती है वो  चारों ओर जब छा जाती निस्तब्धता  बड़े हौले हौले अपने कदम को उठा  दिन निकलने से पहले मुँह को छुपा  दिन भर के लिये रात की दुल्हनियां  न जाने फिर  कहाँ चली जाती है  वो । 

आज मदर्स डे के मौके पर जब सभी अपनी अपनी माँ को याद कर रहे हैं मुझे भी अपनी माँ की याद आई और अनायास ये पंक्तियाँ दिल से निकलीं ........आज दिल में हूक उठती है  सभी पलकें भिंगोते हैं , मगर जबतक माँ रही जिंदा हम उसको कितना सताते हैं ।

न जाने कहां वो चले गये   खेत, खलिहान, नदी, पहाड़ सब ज्यों के त्यों हैं यूँ ही खड़े  सिर्फ जिंदगी में ही क्यों भला इतने तूफां आ के चले गये । अब ढूंढती हैं नजरें उन्हें जिनकी आँखों के हम नूर थे दर बदर खोजा उन्हें पर उनके साये भी हमसे दूर थे । खैरो ख़बर मिलती नहीं किस जहां में जाके वो सो गये है कौन सी वो गली कि जहाँ जाके वहीं के वो हो गये । बड़े नाजों से पाला हमें तामील,तमीज और तहजीब दी कभी भूल हमसे जो हुई कभी माफ करने में न देर की । कभी अपनी ख़बर भेज़ी नहीं न कोई ख़त, पैगाम दिये जो हमारे फिक्र में जीते थे आज इतने सख़्त कैसे हो गये ।  रो रो के हमने सदायें दी, उन्हें  बार बार पुकारा  किये  वो लौट कर न आये फिर न जाने किस जहां में खो गये | 

जिंदगी के खेल बड़े निराले हैं , न जाने कितने रंग दिखलाते हैं हमें और हम उसमें उलझे रह जाते हैं । जिंदगी की फ़ितरत को समझने की कोशिश इन गजलों के बहाने ।

ग़ ज़ल माना है हमने तुमको अपना दिल  से दिलोजां से एतवार करके तो देखो  हर इंसा झूठा नहीं होता । जाना तो होगा ही सबको  एक दिन इस दुनियां से फिरभी न जाने क्यों इसबात का भरोसा नहीं होता । न मेरी भावना समझी न मेरा रंजों गम जाना सिर्फ साथ रहने से कोई ग़मख़्वार नहीं होता । काश जिंदगी जी लेते हम भी  थोड़ी शिद्दत से ग़म है कि वक़्त को पलटना आसां नहीं होता । लाख दोस्त सही एक अकेला मेरा अपना होता जुगनुओं के मेले से क्या कभी दूर अँधेरा होता ।