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गेह

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गेह इस निखिल विश्व के सर्वांग से  एक शून्य को चुरा कर  भर दिया है मैं ने  अपने इच्छित लालसा के रंग से  चारों ओर से भीत खड़ी कर  बसा लिया है उसमें अपना गेह  यह चौकोर और गोलाकार स्थान  अब सिर्फ एक ज्यामितिक आकार नहीं  किसी का खिलखिलाता घर संसार है  एक-एक ईंट को जुड़ते देख  एहसास होता है  मैं कोई चिड़ी हूँ  जो तिनका-तिनका जोड़कर  अपना घोंसला बना रही है  कुछ दिनों में इसमें बच्चे चहचहा रहे होंगे  दीवारों पर पानी डालते  उसके छींटों में भींगती हूँ  अनुभूति ले जाती है मुझे  निर्जन पहाड़ के झरने के पास  दूर-दूर तक उड़ते उसके फेनिल छींटे  और उसमें भींगती मैं  कितना एकांतिक सुख  एकेंद्रिय बन गई हूँ मैं  मेरे रोम-रोम में  जैसे सवेरा खिल रहा है  अपने सपने को साकार होते देख  आंनद की बौछार में भींग रही हूँ  आदिम अभिलाषा है यह  मैं भी इससे परे कैसे हो सकती  एक गेह  एक नेह  बस ...

गंध कई तरह के होते हैं कुछ हमें उन्मत बना देती हैं तो कुछ बेकल पर हर हालत में हमारी अंतर्यात्रा में हमारी सहायक होती है ......

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गंध  ताप से बेकल आँगन में  पानी छिड़क कर बुहारती वह  डूबी जाती है  मिट्टी से उठती सोंधी महक में  भूल जाना चाहती है शहर का अकेलापन  समेट लेना चाहती है  देहात के अपनेपन की गंध को अपने मन में  गाँव की सीमांत से गुजरते हुए  आम की गाछी से आती खुशबू में भिंगी  आश्चर्य में पड़ी है वह  कहाँ से आती है यह महक  किस पेड़, किस फूल, किस पत्ते से  कहीं और क्यों नहीं है  गाँव की यह गंध  जब से वह प्रेम में पड़ी है  उसके तन-मन से उठती है  प्रेम की सुवास  एक मादक गंध  जो उसके आसपास को महकाता है  प्रेमपाश में आबद्ध प्रेमी-युगल के शरीर से  उठती है एक स्वर्गीय सुगंध  जो चहूँ दिशाओं को पवित्र बना देती है  इस प्रेमपाश में बंधी वह सोचती है  क्या यही है वह प्रेम की गंध  जिस पर ब्रह्मांड टिका है  बजती घंटियों  उठती धूप की सुगंध से व्याप्त मंदिर  के एक कोने में बैठी वह  सारे चहल-पहल से हो गई है दूर  बंद...

आज महिला दिवस के अवसर पर समस्त नारी जाति को समर्पित है मेरी यह कविता ........

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नारी  नदिया के दो पाट सरीखा  हे नारी  तेरा जीवन है  इस पार तेरे बाबुल का घर  उस पार खड़ा तेरा प्रियतम है तेरे बिन सूना पिया का आँगन  तुम बिन खाली पीहर है  दो-दो कुल का बोझ तू ढ़ोती  तू इस धरती की हिम्मत है प्रेम, दया, करुणा और ममता तुम से ही भाव ये जिन्दा है  जो तू न  हो इस धरती पर   कितना कटु औ नीरस जीवन है माँ बन कर तू जीवन देती  तुझसे ही सृष्टि चलती है  तेरी कृपा का मोल नहीं है  तू ही प्रकृति की नियति है सुंदर है तू फूल की भाँति  मख़मल सी तू कोमल है  जेठ की तपती धूप ये दुनियां तू नीम की छाया शीतल है घर को तू ही स्वर्ग बनाती  तुझसे ही जीवन का सुख है  तेरे ऋण को चुका सके कोई  किसमें इतनी  शक्ति  है तेरे हृदय में प्रेम की सरिता  धैर्य तेरा फौलादी है  शक्तिरूपिणी, आशीर्वचनी  तू सीता तू ही भवानी है । बड़े मूढ़ हैं ये दुनियांवाले जो तेरी कीमत कम आंकते हैं  प्रकृति की...

प्रकृति की हर घटना अनुपम है चाहे वह वसंत का आगमन हो या पतझड़ का दौर | आज पतझड़ के बहाने ही सही प्रस्तुत कर रही हूँ अपने कुछ मनोभाव -----

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पतझड़ का सौंदर्य सागौन के जंगल से गुजरते हुए देखा मैंने पतझड़ का सौंदर्य माघ माह की सर्द दोपहरी तेज ठंडी हवा का आता-जाता झोंका सूखे पत्तों की होती बरसात अपलक निहारती ही रही निसर्ग के इस विनाश-पर्व को मुझ पर गिरते रहे पीले , सूखे पत्ते सिहराते रहे मुझे अपनी छुअन से होती रही मैं रोमांचित उस चरचर , मरमर से जिस पर पड़ रहे थे मेरे पाँव उस वीरानी से जो बिखरा पड़ा था सूखे पत्तों के साथ चारों ओर मैं ढूँढ़ती रही जीवन-सौंदर्य सूखेपन की सोंधी सी खुशबू में हर पेड़ पर टंगे हैं अब बस कुछ ही पत्ते ज्यूँ टंगे होते हैं बच्चों के पतंग बिजली के खम्भों और झाड़ियों पर नंगे होते जा रहे सागौन के पेड़ गंजे सिर,ठूंठ से खड़े  दे रहे तर्पण अपने ही शरीर के एक -एक अंग को पर ढूँढ़े नहीं ढ़ूँढ़ पाती कहीं उदासी का आलम इस बेरंग , धूसर , जीर्णशीर्ण होते जंगल में भी आ रही कहीं से  फगुनाहट की गंध और आहट नवजीवन और नवबसंत का संदेश लिए |                  --- मुकुल कुमारी अमल...

'निःशब्दता के स्वर' की समीक्षा

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हाल ही में मेरी पुस्तक 'निःशब्दता के स्वर' सिद्धार्थ बुक्स, दिल्ली से प्रकाशित हुई और उसका लोकार्पण हुआ । आज लोकमत समाचार के परिशिष्ट 'लोकरंग' में लब्धकीर्ति साहित्यकार श्...

क़तार

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क़तार क़तार में खड़ा है देश  रफ़्तार है रुकी हुई  अपना पैसा आप नहीं मिलता  साँसें हैं थमी हुई पर चुप रहूँगा मैं  आवाज नहीं उठाऊँगा  विरोध प्रकट किया अगर  देशद्रोही कहलाऊँगा  क़तार में खड़े -खड़े  मातृभूमि का कर्ज़ चुकाऊँगा  भूखा हूँ तो क्या हुआ  मर नहीं जाऊँगा  अगर दो दिन नहीं खाऊँगा  स्वच्छता अभियान में  सरकार का साथ निभाऊँगा  नींद बहुत आयेगी तो  सड़क पर ही सो जाऊँगा  लोकतंत्र का पैरोकार हूँ  लोकतंत्र ने ही सिखाया है  लंबी-लंबी लाईन में हमने वोट गिराया है  देश का सारा धन सिमट गया कुछ हाथों में ईमानदारी से आयकर चुकाऊँगा  पर उनपर उंगली नहीं उठाऊँगा  लोकतंत्र की घुट्टी पीकर  अबतक गृहस्ती चलाई है  लोकतंत्र जब खतरे में है  तो अब क्यों पीठ दिखाऊँगा  क़तार में जीना क़तार में मरना  हमने अब है सीख लिया  लोकतंत्र में लोक की आफत  यही मंत्र दोहराऊँगा ।           ...

दाना माँझी की घटना ने मुझे भी झकझोड़ कर रख दिया, मन में जहाँ एक तरफ गहरी पीड़ा थी तो दूसरी तरफ व्यवस्था के प्रति आक्रोश और अपनी असहाय स्थिति के प्रति क्षुब्धता का भाव तथा पता नहीं और क्या-क्या जो इस रचना के जन्म का कारण बनीं..........

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कालाहाँड़ी   कल रात मैं ने एक अजीब स्वप्न देखा मैं एक काली हाँड़ीनुमा द्वार पर खड़ी हूँ गोल पर छोटा सा है वह द्वार अभी-अभी एक व्यक्ति अपने कंधे पर कुछ लादे भीतर गया है उसके साथ एक बच्ची भी है मैं उसके साथ भीतर जाना चाहती हूँ पर वहाँ खड़ा संतरी मुझे अंदर जाने से रोक देता है मुझसे पूछता है ढ़ेरों सवाल- कौन हो तुम ? कोई खोजी पत्रकार ? शिक्षकों का यहाँ क्या काम ! यहाँ क्यों आये हो ? उस व्यक्ति से क्यों मिलना चाहते हो ? कोई नाता-रिश्ता ? हितैषी !  यह कौन सा रिस्ता होता है ? बताती हूँ उसे कि‌‌‌‌-  वास्तविक आजादी का अर्थ ढूँढने आई हूँ उन प्रश्नों के उत्तर ढूँढने आई हूँ जो मेरे छात्र अक्सर मुझसे पूछते हैं-  ‌‌ 'जब भारत दुनियाँ के दस सबसे धनी देशों में शामिल है तो भी दाना माँझी जैसे लोग देश में क्योंं हैं'?   बच्चे मुझे आँकड़े दिखाते हैं 'भारत व्यक्तिगत संपति के मामले में दुनियां में सातवें स्थान पर है मैडम आप यह क्यों कहती हैं कि भारत गरीब है' मेरे छात्र समृद्ध परिवारों से आते हैं उन्हें नहीं पता गरीबी क्या होती ह...