विचार शून्यता की अवस्था प्राप्त करना बड़ा कठिन है, ध्यान में उतरने और शून्यता को महसूसने के अनुभव को लिपिबद्ध करने की एक कोशिश का परिणाम है यह कविता ........

शून्य की खोज

अंधकार
कोहरा
स्याही
तिमिर आच्छादित है
इस अंतस का आसमान और पाताल
कोई ओर-छोड़ नहीं
एक बेचैनी
एक छटपटाहट
उससे बाहर निकलने की एक कोशिश
प्रयत्न, प्रयत्न और प्रयत्न
शरीर का अणु-अणु
इस प्रयत्न में शामिल
लेकिन लगती है हाथ
सिर्फ असफलता
ध्यान बार-बार अपने शरीर और आसपास पर ही अटका है
सर को एक झटका दे 
अपने अंदर झांकने की एक और कोशिश 
चारों ओर सिर्फ अंधेरा
और अंधेरे की कई आभाएँ  
कुछ लकीरें जो इन अंधेरों से टकराती हैं
स्याही का एक गुब्बार आता है
फिर दूसरा, तीसरा और गुजर जाता
एक दुसरे में सब गड्ड-मड्ड
फिर दिखता है हल्का प्रकाश
जिसे ये अंधेरे अपने चारों ओर से दबोच
एक बिंदु में बदल देते हैं
फिर प्रकाश का दूसरा गोला
और उसका छोटा होता जाना
फिर प्रकाश के कई गोले
और सबका छोटा होता जाना
फिर दिखती है हल्की प्रकाश की
एक अनवरत झलक
और उसका तीव्रतर होता जाना
प्रकाश, प्रकाश और प्रकाश
जैसे एक साथ कई सूर्य उदित हुआ हो
अजस्र उर्जा का बहाव
डर सा लगता है
कहीं कोई विस्फोट न हो जाये
इस सब के बीच ध्यान आता है शरीर का
वह तो जैसे है ही नहीं
हो गया है हल्का
बिल्कुल निर्भार
जैसे उड़ रहा हो हवाओं के साथ
विचारों का चलना रुक गया है
मेरे चारों ओर है सिर्फ शून्य और शून्य
शरीरविहीन, विचारविहीन   
मैं कुछ नहीं हूँ
मैं शून्य हूँ
स्व में स्थित
परम शांति का अनुभव
चारों ओर है अनन्त प्रकाश का ज्वार
और एक मधुर संगीत अहर्निश |





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