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मानसून की पहली बरखा के साथ सारा परिदृश्य बदल गया, गर्मी से राहत मिली, मन को सुकून | ऐसे मौके पर पेश है एक छोटी सी रचना मौसम की पहली बरखा................

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                                 मौसम की पहली बरखा इस मौसम की पहली बरखा यहाँ  हुई अभी-अभी सोंधी-सोंधी खुशबू आती है  मिट्टी से  भली-भली। सबकुछ धुल कर साफ हो गए छत  आँगन गली-गली ठंढी हवा का असर  मस्त है लगती  तबीयत भरी-भरी। कितनी  बेरंगी और झुलसी थी  जिंदगी मरी-मरी बिजली चमकी   मेघ उड़े तो लय  में आ गई खड़ी-खड़ी। माल-मवेशी  बूढ़े और बच्चे  छोटी  सी गुइयाँ ता-ता थई-थई घर के बाहर निकल पड़े सब ताजी  हवा में खुली-खुली। वर्षा की बूँदें टप-टप बरसे पास में  चाय की प्याली भरी-भरी साथ दोस्तों की दिलकश बातें गर्म  कबाब हो तली-तली।        -----मुकुल अमलास ( चित्र गूगल से साभार)                        

आज अपने पिता को याद करने का दिन है, मुझे भी अपने पिता बहुत याद आए और दिल से निकले ये उदगार.......

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बाबुजी  मेरे मन के आँगन में स्थापित  एक तुलसी का चौड़ा  अमृत संचित एक भव्य कलश एक ऐसी मूर्ति जिसपर कभी धूल नहीं जमी एक ऐसा व्यक्तित्व जो रहा  सदा मेरा संबल  ज्ञान की पराकाष्ठा  उदात्त व्यक्तित्व  निर्मल चरित्र  इस पूरे ब्रह्मांड में एकमात्र व्यक्ति  जिसपर मैं आँख मूँद कर भरोसा कर सकती अपने पर भी इतना विश्वास नहीं रहा कभी  शायद मैं अपने बारे में गलत निर्णय ले भी सकती  पर वो - कभी मेरे लिए कुछ गलत नहीं होने देंगे  ऐसा अडिग विश्वास रही मेरी थाती  मानती हूँ ख़ुशनसीब खुद को  कितने होते हैं इतने सौभाग्यशाली  जिन्हें पता है कहीं भी बैठा हो  धरती पर है कोई अबलंब उसका कोई रक्षक जो संकट आने पर  उसका बाल नहीं बांका होने देगा निरंतर प्रवाहित आशिर्वाद की सरिता  एक अमल, धवल, अडिग हिमालय  मेरे जीवन की सबसे बड़ी पूँजी  मेरे बाबूजी ।               --मुकुल कुमारी अमलास ( फोटो गूगल से साभार)  ...

गर्मी की छुट्टी यानि अपनों से मिलने का समय | बच्चे अपने गाँव हो आते हैं दादा-दादी, नाना-नानी से मिल आते हैं, तो आज की कविता उनके लिए..............

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                                           नानी के घर आया हूँ  काली कोयल कहाँ से आई  क्यों  इतना चिल्लाती हो  कुहु-कुहु का राग सुना कर  क्यों मुझको अभी जगाती हो जेठ की ताप से बेकल होकर  क्या तुम यूँ शोर मचाती हो  या अमराई के पके आम की  खुशबू से बौराई हो गर्मी की छुट्टी है मेरी  मैं नानी घर आया हूँ  प्यारी सी कथा को सुनकर लंबी तान कर सोया हूँ जैसे ही स्कूल खुलेगा  बड़े सबेरे मेरी माँ मुझे जगायेगी  नहा-धुला तैयार करा कर बस में मुझे चढ़ाएगी नानी की कथा है सुंदर  सपनों में भरमाया हूँ  देवलोक की सैर मैं करके  अभी परीलोक में आया हूँl  नाना सुबह की सैर में जाते  नानी मंदिर हो आती है  लड्डू- पेड़े का भोग लगा कर  फिर वो मुझे खिलाती है थोड़ा और ठहर जा कोयल  मैं खुद ही उठ जाऊँगा खा-पी करके मामू संग...

गेह

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गेह इस निखिल विश्व के सर्वांग से  एक शून्य को चुरा कर  भर दिया है मैं ने  अपने इच्छित लालसा के रंग से  चारों ओर से भीत खड़ी कर  बसा लिया है उसमें अपना गेह  यह चौकोर और गोलाकार स्थान  अब सिर्फ एक ज्यामितिक आकार नहीं  किसी का खिलखिलाता घर संसार है  एक-एक ईंट को जुड़ते देख  एहसास होता है  मैं कोई चिड़ी हूँ  जो तिनका-तिनका जोड़कर  अपना घोंसला बना रही है  कुछ दिनों में इसमें बच्चे चहचहा रहे होंगे  दीवारों पर पानी डालते  उसके छींटों में भींगती हूँ  अनुभूति ले जाती है मुझे  निर्जन पहाड़ के झरने के पास  दूर-दूर तक उड़ते उसके फेनिल छींटे  और उसमें भींगती मैं  कितना एकांतिक सुख  एकेंद्रिय बन गई हूँ मैं  मेरे रोम-रोम में  जैसे सवेरा खिल रहा है  अपने सपने को साकार होते देख  आंनद की बौछार में भींग रही हूँ  आदिम अभिलाषा है यह  मैं भी इससे परे कैसे हो सकती  एक गेह  एक नेह  बस ...

गंध कई तरह के होते हैं कुछ हमें उन्मत बना देती हैं तो कुछ बेकल पर हर हालत में हमारी अंतर्यात्रा में हमारी सहायक होती है ......

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गंध  ताप से बेकल आँगन में  पानी छिड़क कर बुहारती वह  डूबी जाती है  मिट्टी से उठती सोंधी महक में  भूल जाना चाहती है शहर का अकेलापन  समेट लेना चाहती है  देहात के अपनेपन की गंध को अपने मन में  गाँव की सीमांत से गुजरते हुए  आम की गाछी से आती खुशबू में भिंगी  आश्चर्य में पड़ी है वह  कहाँ से आती है यह महक  किस पेड़, किस फूल, किस पत्ते से  कहीं और क्यों नहीं है  गाँव की यह गंध  जब से वह प्रेम में पड़ी है  उसके तन-मन से उठती है  प्रेम की सुवास  एक मादक गंध  जो उसके आसपास को महकाता है  प्रेमपाश में आबद्ध प्रेमी-युगल के शरीर से  उठती है एक स्वर्गीय सुगंध  जो चहूँ दिशाओं को पवित्र बना देती है  इस प्रेमपाश में बंधी वह सोचती है  क्या यही है वह प्रेम की गंध  जिस पर ब्रह्मांड टिका है  बजती घंटियों  उठती धूप की सुगंध से व्याप्त मंदिर  के एक कोने में बैठी वह  सारे चहल-पहल से हो गई है दूर  बंद...

आज महिला दिवस के अवसर पर समस्त नारी जाति को समर्पित है मेरी यह कविता ........

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नारी  नदिया के दो पाट सरीखा  हे नारी  तेरा जीवन है  इस पार तेरे बाबुल का घर  उस पार खड़ा तेरा प्रियतम है तेरे बिन सूना पिया का आँगन  तुम बिन खाली पीहर है  दो-दो कुल का बोझ तू ढ़ोती  तू इस धरती की हिम्मत है प्रेम, दया, करुणा और ममता तुम से ही भाव ये जिन्दा है  जो तू न  हो इस धरती पर   कितना कटु औ नीरस जीवन है माँ बन कर तू जीवन देती  तुझसे ही सृष्टि चलती है  तेरी कृपा का मोल नहीं है  तू ही प्रकृति की नियति है सुंदर है तू फूल की भाँति  मख़मल सी तू कोमल है  जेठ की तपती धूप ये दुनियां तू नीम की छाया शीतल है घर को तू ही स्वर्ग बनाती  तुझसे ही जीवन का सुख है  तेरे ऋण को चुका सके कोई  किसमें इतनी  शक्ति  है तेरे हृदय में प्रेम की सरिता  धैर्य तेरा फौलादी है  शक्तिरूपिणी, आशीर्वचनी  तू सीता तू ही भवानी है । बड़े मूढ़ हैं ये दुनियांवाले जो तेरी कीमत कम आंकते हैं  प्रकृति की...

प्रकृति की हर घटना अनुपम है चाहे वह वसंत का आगमन हो या पतझड़ का दौर | आज पतझड़ के बहाने ही सही प्रस्तुत कर रही हूँ अपने कुछ मनोभाव -----

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पतझड़ का सौंदर्य सागौन के जंगल से गुजरते हुए देखा मैंने पतझड़ का सौंदर्य माघ माह की सर्द दोपहरी तेज ठंडी हवा का आता-जाता झोंका सूखे पत्तों की होती बरसात अपलक निहारती ही रही निसर्ग के इस विनाश-पर्व को मुझ पर गिरते रहे पीले , सूखे पत्ते सिहराते रहे मुझे अपनी छुअन से होती रही मैं रोमांचित उस चरचर , मरमर से जिस पर पड़ रहे थे मेरे पाँव उस वीरानी से जो बिखरा पड़ा था सूखे पत्तों के साथ चारों ओर मैं ढूँढ़ती रही जीवन-सौंदर्य सूखेपन की सोंधी सी खुशबू में हर पेड़ पर टंगे हैं अब बस कुछ ही पत्ते ज्यूँ टंगे होते हैं बच्चों के पतंग बिजली के खम्भों और झाड़ियों पर नंगे होते जा रहे सागौन के पेड़ गंजे सिर,ठूंठ से खड़े  दे रहे तर्पण अपने ही शरीर के एक -एक अंग को पर ढूँढ़े नहीं ढ़ूँढ़ पाती कहीं उदासी का आलम इस बेरंग , धूसर , जीर्णशीर्ण होते जंगल में भी आ रही कहीं से  फगुनाहट की गंध और आहट नवजीवन और नवबसंत का संदेश लिए |                  --- मुकुल कुमारी अमल...