संदेश

क्षणभंगुरता जीवन का सत्य है..........

चित्र
क्षणभंगुरता वर्षा के बाद खिड़की के ग्रिल में  पंक्तिबद्ध बूँदों की कतारें  लुभाता है मुझे  क्षणभर को उसमें  सारा आसमान दिख जाता है  इस लघुता की महत्ता  विस्मित करती है  झाँकती हूँ उसमें अपना चेहरा  पलभर को विहँसती हूँ  तभी टपक धूल में मिलना उसका  कर जाता है घायल   मुदित मन छटपटा उठता है  सौंदर्य की क्षणभंगुरता  विचलित करती है मुझे  पर सत्य से साक्षात्कार  भी तो  करवाती हैं  ऐसी ही घटनाएं ।

आज छुट्टी के दिन बिल्कुल खाली बैठी हूँ तो इस खालीपन के ही नाम कुछ लिखा है,पेश है..........

चित्र
 रिक्तता आँख बंद करते ही वास्तविक दुनियां विलीन हो जाती है पर सामने होते हैं अनेक रंगों की आभायें कभी लाल , कभी पीली,  कभी नीली उस अंधेरी दुनियाँ को ग़ौर से देखती हूँ  पाती हूँ धब्बों और रेखाओं का एक अनंत सिलसिला हिलता एक दूसरे में मिलता निरंतर गतिमान रंग और धब्बे मिल कर एक खेल सा खेलते हैं जैसे हो वह कोई मॉडर्न पेंटिंग का नमूना गतिेशीलता सिर्फ बाहर नहीं अंदर भी है आँखों के अंदर , विचारों के अंदर कहाँ कभी हम होते खाली उठता ही रहता विचारों का बबंडर धाराशायी होते ही रहते सपनों के महल आँख मूंद लेने से कुछ न होगा क्या पात्र को सिर्फ उल्टा कर देने से  वह खाली हो जाता है कुछ न कुछ भरा ही रहता है भले दिखाई न दे  चाहे वह हो सिर्फ विचार रूपी हवा ही   बहुत खेल लिया यह खेल चलो अब शुरु करते हैं  अपने को खाली करने का  एक नया खेल सारे कचरों को बाहर फेंक अंदर से हो जायें बिल्कुल स्वच्छ निर्द्वंद,  रिक्त शून्य की भाँति चलो ढूँढते हैं उस क्षण , उस पल , उस अवस्था को जब एक चुप्प...

किसी अपने को खोना अपूरणीय क्षति है, दुःखद है, पर दुनियां में अगर कोई सत्य है तो वह है मृत्यु जिसे झुठलाया नहीं जा सकता और मानव उसके सामने लाचार है,ऐसी ही लाचार मनःस्थिति में निकले हैं ये शब्द----

श्रद्धांजलि दशों दिशाएं चुप्प हैं घुप्प काले बादल घिरे आ रहे मृत्यु शोक का सन्नाटा फैला है चारों ओर कोई शरीर का चोगा छोड़ गया मैं भागी आ रही उस प्रिय आत्मन को देखने पर मरने के बाद मिट्टी को मिट्टी में मिलाने की क्यों रहती इतनी जल्दी आख़िर इस शरीर की मृत्यु से बढ़ कर अंतिम गति और क्या होगी समझाना चाहती हूँ खुद को मृत्यु छीन लेती है हमसे अपने सगे को सदा के लिये एक अंतिम बार उसे देख लेने से यह दुःख कम तो नहीं हो जाता फिरभी अंतिम दर्शन नहीं कर पाई इस बात से कलेजा मुँह को क्यों आ रहा मेरा आँखों के सामने धुंध सा छाया है और आँखों से बह रही जलधारा सावन की हरियाली वीरानी में बदल गई है एक और भी है जो है चुप पर उसकी सूनी कलाई देख मुझमें क्यों रुदन का बेग फूट रहा सबलोग तो सामान्य हो चुके उसे विदा कर बल्कि कुछ के लिए तो यह मौका है उत्सव का अब सब आयेंगे पंडित और लोगों की भीड़ में होंगी कर्मकांड की नौटंकियाँ मेरा ही मन क्यों भागता है इस सब से जिंदा रहते जो दे न सके दो मीठे बोल इस सबसे क्या दे सकेंगे मृत आत्मा को सदगति होता है दर्द देख कर बिडंबना जिन लोगों ने...

मानसून की पहली बरखा के साथ सारा परिदृश्य बदल गया, गर्मी से राहत मिली, मन को सुकून | ऐसे मौके पर पेश है एक छोटी सी रचना मौसम की पहली बरखा................

चित्र
                                 मौसम की पहली बरखा इस मौसम की पहली बरखा यहाँ  हुई अभी-अभी सोंधी-सोंधी खुशबू आती है  मिट्टी से  भली-भली। सबकुछ धुल कर साफ हो गए छत  आँगन गली-गली ठंढी हवा का असर  मस्त है लगती  तबीयत भरी-भरी। कितनी  बेरंगी और झुलसी थी  जिंदगी मरी-मरी बिजली चमकी   मेघ उड़े तो लय  में आ गई खड़ी-खड़ी। माल-मवेशी  बूढ़े और बच्चे  छोटी  सी गुइयाँ ता-ता थई-थई घर के बाहर निकल पड़े सब ताजी  हवा में खुली-खुली। वर्षा की बूँदें टप-टप बरसे पास में  चाय की प्याली भरी-भरी साथ दोस्तों की दिलकश बातें गर्म  कबाब हो तली-तली।        -----मुकुल अमलास ( चित्र गूगल से साभार)                        

आज अपने पिता को याद करने का दिन है, मुझे भी अपने पिता बहुत याद आए और दिल से निकले ये उदगार.......

चित्र
बाबुजी  मेरे मन के आँगन में स्थापित  एक तुलसी का चौड़ा  अमृत संचित एक भव्य कलश एक ऐसी मूर्ति जिसपर कभी धूल नहीं जमी एक ऐसा व्यक्तित्व जो रहा  सदा मेरा संबल  ज्ञान की पराकाष्ठा  उदात्त व्यक्तित्व  निर्मल चरित्र  इस पूरे ब्रह्मांड में एकमात्र व्यक्ति  जिसपर मैं आँख मूँद कर भरोसा कर सकती अपने पर भी इतना विश्वास नहीं रहा कभी  शायद मैं अपने बारे में गलत निर्णय ले भी सकती  पर वो - कभी मेरे लिए कुछ गलत नहीं होने देंगे  ऐसा अडिग विश्वास रही मेरी थाती  मानती हूँ ख़ुशनसीब खुद को  कितने होते हैं इतने सौभाग्यशाली  जिन्हें पता है कहीं भी बैठा हो  धरती पर है कोई अबलंब उसका कोई रक्षक जो संकट आने पर  उसका बाल नहीं बांका होने देगा निरंतर प्रवाहित आशिर्वाद की सरिता  एक अमल, धवल, अडिग हिमालय  मेरे जीवन की सबसे बड़ी पूँजी  मेरे बाबूजी ।               --मुकुल कुमारी अमलास ( फोटो गूगल से साभार)  ...

गर्मी की छुट्टी यानि अपनों से मिलने का समय | बच्चे अपने गाँव हो आते हैं दादा-दादी, नाना-नानी से मिल आते हैं, तो आज की कविता उनके लिए..............

चित्र
                                           नानी के घर आया हूँ  काली कोयल कहाँ से आई  क्यों  इतना चिल्लाती हो  कुहु-कुहु का राग सुना कर  क्यों मुझको अभी जगाती हो जेठ की ताप से बेकल होकर  क्या तुम यूँ शोर मचाती हो  या अमराई के पके आम की  खुशबू से बौराई हो गर्मी की छुट्टी है मेरी  मैं नानी घर आया हूँ  प्यारी सी कथा को सुनकर लंबी तान कर सोया हूँ जैसे ही स्कूल खुलेगा  बड़े सबेरे मेरी माँ मुझे जगायेगी  नहा-धुला तैयार करा कर बस में मुझे चढ़ाएगी नानी की कथा है सुंदर  सपनों में भरमाया हूँ  देवलोक की सैर मैं करके  अभी परीलोक में आया हूँl  नाना सुबह की सैर में जाते  नानी मंदिर हो आती है  लड्डू- पेड़े का भोग लगा कर  फिर वो मुझे खिलाती है थोड़ा और ठहर जा कोयल  मैं खुद ही उठ जाऊँगा खा-पी करके मामू संग...

गेह

चित्र
गेह इस निखिल विश्व के सर्वांग से  एक शून्य को चुरा कर  भर दिया है मैं ने  अपने इच्छित लालसा के रंग से  चारों ओर से भीत खड़ी कर  बसा लिया है उसमें अपना गेह  यह चौकोर और गोलाकार स्थान  अब सिर्फ एक ज्यामितिक आकार नहीं  किसी का खिलखिलाता घर संसार है  एक-एक ईंट को जुड़ते देख  एहसास होता है  मैं कोई चिड़ी हूँ  जो तिनका-तिनका जोड़कर  अपना घोंसला बना रही है  कुछ दिनों में इसमें बच्चे चहचहा रहे होंगे  दीवारों पर पानी डालते  उसके छींटों में भींगती हूँ  अनुभूति ले जाती है मुझे  निर्जन पहाड़ के झरने के पास  दूर-दूर तक उड़ते उसके फेनिल छींटे  और उसमें भींगती मैं  कितना एकांतिक सुख  एकेंद्रिय बन गई हूँ मैं  मेरे रोम-रोम में  जैसे सवेरा खिल रहा है  अपने सपने को साकार होते देख  आंनद की बौछार में भींग रही हूँ  आदिम अभिलाषा है यह  मैं भी इससे परे कैसे हो सकती  एक गेह  एक नेह  बस ...