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आज महिला दिवस पर महिलाओं को समर्पित है मेरी यह कविता .........

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नारी की चाह मैं सुंदर हूँ मैं कोमल हूँ मैं फूल हूँ मैं ही कली हूँ झूठी प्रशंसा मेरी मत करना मैं धरती हूँ और चाहती पग धरती पे ही धरुं बस सम्मान की चाह करूं स्त्री सदा सुंदर नहीं होती क्यों पैमाने पे खड़ी उतरुं काला कलूटा रूप हो मेरा या बेडौल स्वरूप धरुं ईश्वर की मैं अनुपम रचना हृदय में भाव भरुं बस सम्मान की चाह करूं मुझको तुम देवी न बनाना न मैं श्रद्धा की चाह करूं दया का पात्र कभी बनूं ना बस इतनी सोच धरूं इंसा हूँ इंसान रहूँ मैं उससे कम न स्वीकार करूं बस सम्मान की चाह करूं मुझको अपनी पहचान ढूँढ़नी मेहनत से आगे बढूं अपना निर्णय आप ही लूँ मैं दृढ़ संकल्प करुं कमजोर भले ही पंख हों मेरे हौसले से नभ में उरूं बस सम्मान की चाह करुं  ....मुकुल कुमारी अमलास ( चित्र गूगल से साभार )

आओ खेलें होली

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आओ खेलें होली भूल के सब रंजो-गम आओ खेलें होली रंग-अबीर उड़ाएँ छक कर खुशियों से भरें झोली आओ खेलें होली दुःख और गम तो साथ रहेंगे जब तक साँस की डोरी दे ढोलक पे थाप नच लो अब जिंदगानी बची है थोड़ी आओ खेलें होली जम कर आज धमाल मचा लो क्यों करते होड़ा-होड़ी धर्म-जाति का बंधन भूल बन जाओ हमजोली आओ खेलें होली जिनका आज अपना नहीं कोई उनकी बनाएं टोली मिलकर सब नाचें और थिरकें बाँटें खुशियां थोड़ी आओ खेलें होली न हो कोई आज अकेला सबकी बन जाए जोड़ी आज किसी पर रंग तुम डारो कर लो जोड़ा-जोड़ी आओ खेलें होली गालों पे गुलाल सजाओ आँचल न रहे कोई कोरी अपने मन की आज करें सब कोई साध रहे न अधूरी आओ खेलें होली ।

रात के भी अपने बोल होते हैं एक दिन सुनने की कोशिश की तो वो उतर आई इस कविता में....

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रात की आवाज रात की निस्तब्धता में   चलती घड़ी की सुई भी   लगती शोर मचाती  दूर से आती कुत्ते के रोने की आवाज़ मन को कितना घबराती   पुल से गुजरती रेल   रात के तिलिस्म को तोड़ती   बेधड़क दौड़ती रात की गहराई से होड़ लेती नींद नहीं आने की बोरियत   दूर करने को करवट   बदलते  सुनाई देती   बदन के हड्डी की कड़क  पेट की गुड़गुड़ाहट      उंगलियों से उंगलियाँ फोड़ते         टूटती  उंगलियों की तड़क  गूँजती रहती थोड़ी देर तक खिड़की से आती हवा परदे की सरसराहट झींगुर की आवाज सी कोई   झनझनाहट चारों दिशाओं से उठती  क्या सच    रात की खामोशी भी बातें करती है ?                     ---- मुकुल कुमारी अमलास  ( चित्र गूगल से साभार ) 

शब्दातीत

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  शब्दातीत कुछ लिखते या कहते  निरंतर उत्सृष्ट होते मेरे शब्द  शब्दों की एक दुनियां  हर शब्द से निकलते अर्थ  शब्दों में ढूँढी जाती हूँ मैं  मतलब निकालते लोग  एक अपराधबोध के भंवर में  डुबती-उतराती मैं  अचंभित होती हूँ  क्या सच मैं वही हूँ  जो ये शब्द कहते हैं  या इससे इतर भी कुछ  जो मेरी आँखें कहती हैं  मेरी शब्दातीत भावनाएं  जिन्हें मैं अभिव्यक्त नहीं कर पाती  मेरी उँगलियों के पोरों की छुअन  मेरे मुस्कान की तासीर या आँखों से ढुलके हुए आँसू  मेरे ही तो हिस्से हैं  मेरे प्राणों का एक अंश   उनका महत्व क्यों नहीं  डर लगने लगा है  शब्दों की इस दुनियां से  जुड़ना चाहती   सिर्फ भावों, संवेदनाओं के तंतुओं से  होना चाहती  बोधगम्य बिना शव्दों के  जीना चाहती  उस दुनियां में जाकर  जहाँ जीया जाता है  बिना भाषा और स्वर के  अपने सत्य स्वरूप के साथ  तरुओं की भांत...

हर लड़की में एक बावलापन छुपा होता है आज अंतर्राष्ट्रीय बालिका दिवस पर यह कविता उसी बावलेपन के नाम-----

हर लड़की  हर  लड़की  थोड़ी सी पागल होती है  बौराई सी ढूँढती है  बादल और पानी सा सामीप्य  धरती आसमान सी दूरी  फूल और भौंरों सा संबंध चाहती है  गौरैया की भाँति  एक घोंसला बना कर  ...

क्षणभंगुरता जीवन का सत्य है..........

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क्षणभंगुरता वर्षा के बाद खिड़की के ग्रिल में  पंक्तिबद्ध बूँदों की कतारें  लुभाता है मुझे  क्षणभर को उसमें  सारा आसमान दिख जाता है  इस लघुता की महत्ता  विस्मित करती है  झाँकती हूँ उसमें अपना चेहरा  पलभर को विहँसती हूँ  तभी टपक धूल में मिलना उसका  कर जाता है घायल   मुदित मन छटपटा उठता है  सौंदर्य की क्षणभंगुरता  विचलित करती है मुझे  पर सत्य से साक्षात्कार  भी तो  करवाती हैं  ऐसी ही घटनाएं ।

आज छुट्टी के दिन बिल्कुल खाली बैठी हूँ तो इस खालीपन के ही नाम कुछ लिखा है,पेश है..........

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 रिक्तता आँख बंद करते ही वास्तविक दुनियां विलीन हो जाती है पर सामने होते हैं अनेक रंगों की आभायें कभी लाल , कभी पीली,  कभी नीली उस अंधेरी दुनियाँ को ग़ौर से देखती हूँ  पाती हूँ धब्बों और रेखाओं का एक अनंत सिलसिला हिलता एक दूसरे में मिलता निरंतर गतिमान रंग और धब्बे मिल कर एक खेल सा खेलते हैं जैसे हो वह कोई मॉडर्न पेंटिंग का नमूना गतिेशीलता सिर्फ बाहर नहीं अंदर भी है आँखों के अंदर , विचारों के अंदर कहाँ कभी हम होते खाली उठता ही रहता विचारों का बबंडर धाराशायी होते ही रहते सपनों के महल आँख मूंद लेने से कुछ न होगा क्या पात्र को सिर्फ उल्टा कर देने से  वह खाली हो जाता है कुछ न कुछ भरा ही रहता है भले दिखाई न दे  चाहे वह हो सिर्फ विचार रूपी हवा ही   बहुत खेल लिया यह खेल चलो अब शुरु करते हैं  अपने को खाली करने का  एक नया खेल सारे कचरों को बाहर फेंक अंदर से हो जायें बिल्कुल स्वच्छ निर्द्वंद,  रिक्त शून्य की भाँति चलो ढूँढते हैं उस क्षण , उस पल , उस अवस्था को जब एक चुप्प...