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हर कामकाजी व्यक्ति अपने जीवन में कभी न कभी आलस्य और प्रमाद से जूझता ही है , इसी आलस्य और जीवनक्रम को वाणी देने की एक कोशिश......

जीवन की छाँव-धूप भोर का धुंधलका नींद से लरजती आँखें आलस्य से भरमाया शरीर पोर-पोर में मीठा-मीठा दर्द थोड़ी देर लिहाफ में और पड़े रहने का सुख तलाशाता यह मन काम पर जाने न जाने की कसमकस अलार्म की ट्रिन्ग-ट्रिन्ग सुनना जीवन की सबसे कर्कश ध्वनि   अपनी इच्छाशक्ति को समेटने की जद्दोजहद फिर शरीर के बोझ को धरती पर उतारने की कोशिश चाय से उठती हल्की-हल्की भाप फिर थोड़ी ताजगी का आभास स्नान और ध्यान के बाद महसूस करती हूँ अपने भीतर सूर्योदय होने का एहसास ठंडी हवा का झोंका जब चेहरे को स्पर्श करता है समूचे शरीर में स्फूर्ती भर जाती है आँखें बंद कर तुलसी में जल डालते ही पाती हूँ अपने चारों ओर हजारों सूर्यों का प्रकाश अहोभाव से हाथ जुड़ जाते हैं अस्तित्व को देते हुए धन्यवाद एक नई सुबह एक नये दिन के लिए जहाँ साबित करनी है अपनी कर्मठता और निभाना है अपने जीवित रहने का धर्म झोला उठा कर चल पड़ती हूँ अपनी कर्मभूमि की ओर तत्काल जीवंत , उत्साहन्वित , उर्जान्वित |