आज अपने पिता को याद करने का दिन है, मुझे भी अपने पिता बहुत याद आए और दिल से निकले ये उदगार.......


बाबुजी 


मेरे मन के आँगन में स्थापित 
एक तुलसी का चौड़ा 
अमृत संचित एक भव्य कलश
एक ऐसी मूर्ति जिसपर कभी धूल नहीं जमी
एक ऐसा व्यक्तित्व जो रहा 
सदा मेरा संबल 
ज्ञान की पराकाष्ठा 
उदात्त व्यक्तित्व 
निर्मल चरित्र 
इस पूरे ब्रह्मांड में एकमात्र व्यक्ति 
जिसपर मैं आँख मूँद कर भरोसा कर सकती
अपने पर भी इतना विश्वास नहीं रहा कभी 
शायद मैं अपने बारे में गलत निर्णय ले भी सकती 
पर वो -
कभी मेरे लिए कुछ गलत नहीं होने देंगे 
ऐसा अडिग विश्वास रही मेरी थाती 
मानती हूँ ख़ुशनसीब खुद को 
कितने होते हैं इतने सौभाग्यशाली 
जिन्हें पता है कहीं भी बैठा हो 
धरती पर है कोई अबलंब
उसका कोई रक्षक
जो संकट आने पर 
उसका बाल नहीं बांका होने देगा
निरंतर प्रवाहित आशिर्वाद की सरिता 
एक अमल, धवल, अडिग हिमालय 
मेरे जीवन की सबसे बड़ी पूँजी 
मेरे बाबूजी । 
          
  --मुकुल कुमारी अमलास

( फोटो गूगल से साभार) 

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